मृत्यु लोक

 मृत्यु लोक

अवधेश यादव ,महराजगंज,उत्तर प्रदेश

. मृत्यु लोक (कहानी)

जुलाई के महीने में आसमान को बादलों ने चारो तरफ से घेरे हुए थे।बाहर सड़क पर एक दम गुप् अंधेरा छाया हुआ था।रह-रह के बारिश की बूंदे हल्की-हल्की फुहारों के साथ धरती को गीला किये जा रही थी।

सड़क के उस पार बने दो मंजिले मकान से हल्की-हल्की रोशनी आ रही थी।
उसी मकान से उस रोशनी के साथ किसी छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ भी आधे घण्टे से लगातार सुनाई दे रही थी।
अपने कमरे के खिड़की से बार-बार झांकते हुए सुरेश अपने मन में सोचे जा रहा था”लगता है चुप करवाने वाले घर के सदस्य कहीं बिजी हैं!
पर ऐसा कौन सा व्यस्तता!
चार-पांच लोग तो रहतें हैं उस घर में!आखिर सारे लोग गए तो कहाँ गए!
कहीं वे भी तो नहीं???
अरे..नहीं…नहीं..!
यह सोचते ही सुरेश के चेहरे पर डर
और शंका के बादल एक साथ दौड़ने लगतें हैं।
कमरें से बाहर निकल कर वह धीरे-धीरे अपने अम्मा और बाबू जी के कमरे की तरफ़ जाता।उन्हें खिड़की से झाँक कर देखता है तो उसे थोड़ा इत्मीनान होता है।

पर उस बच्चे की रोने की आवाज़ अब भी लगातार सुनाई दे रही थी।उसकी रुलाई को सुन कर सुरेश को अब उलझन होने लगी थी।मन उसका अजीब तरह से अकुलाने लगा था।
क्या करे ?
क्या उसे वहां जाना चाहिए ?
क्या पता उसकी माँ कहीं चली गयी हो?शायद आती ही होगी!

कुछ देर वेट कर के देख लेता हूं!
पर घर में कोई तो होना चाहिये!
घर में नहीं तो पड़ोस वाले कहाँ गए!
वह निर्णय नहीं ले पा रहा था।
जैसे कोई उसे रोक रहा हो।

कुछ देर इधर-उधर टहलने के बाद..।
उसे आभास हुआ नहीं-नहीं मुझें जाना ही चाहिए!
कहीं बच्चा सच मे अकेला हुआ तो!

तब तक उसे दूर से रोने की आवाज़ फिर सुनाई देती है।इस बार किसी अधेड़ औरत की आवाज़ थी।वह ‘कारन’ कर के रो रही थी।एक अजीब तरह की भयानक आवाज़ में।

“शायद उसके यहां कोई मर गया!
यह कहता हुआ सुरेश बाहर के दरवाजे को खोल देता है।
बाहर माहौल एक दम से सुनसान
चारो तरफ सन्नाटा छाया हुआ था।बरसात के मौसम में रातें जाने क्यों भयानक हो जाती हैं।
शायद उसकी ख़ामोशी उसे भयानक बनाती है।बरसात के मौसम,अक्सर ख़ामोश रहते हैं।जैसे इन महीनों में उसका मौन ब्रत हो।
ख़ामोश चींजे अक्सर कई सवाल खड़े करते हैं।जैसे कोई ‘नागा साधू’ जो चुप-चाप घूरता है,जिसकी ख़ामोशी हमेशा कई सवाल खड़े करते हैं।

बाहर बस तीन आवाजें ही सुनाई दे रही थीं।जो उस विशाल खामोशी को तोड़े जा रही थी।वह तीनों आवाजें रोने की आ रही थी।उस बच्चे की,अधेड़ औरत की और गली के कुत्तों की।
यह देख कर उसका दिल बैठे जा रहा था।
सुरेश जैसे ही बाहर कदम रखता है,अंदर से उसकी माँ का आवाज आता है,”कहां जा रहा है?
देखता नहीं माहौल कितना खराब है!

कहीं नहीं अम्मा,बस बाहर का हवा खाने के लिए दरवाज़ा खोला था।
सुरेश अपनी माँ को कुछ बताना नहीं चाहता था।बेवजह परेसान होती।दो दिन से बेचारी सोई नहीं थी।
इस लिए वह दबे पांव उस घर की ओर बढ़ जाता है।

बाहर कॉलोनी में कुत्ते झुंड बनाये इधर-उधर बेचैन दिखाई दे रहे थे।
अभी रात के बस 9 ही बज रहे थे, पर एक-दो घरों को छोड़ कर सारे घरों में अंधेरा छाया हुआ था।

सुरेश तेज़ी से उस घर की तरफ़ चले जा रहा था।बारिश के होने से वतावरण काफ़ी ठंड हो चुका था।सड़क को पार करते हुए उसे तेज़ ठंढी हवा का अहसास हुआ।वह अचानक से कांप जाता है ।

सुरेश घर के बाउंड्री में लगे लोहे के गेट को खोलता है और अंदर दाख़िल हो जाता है।उसे दूर से ही घर में लगी एक सीढ़ी नज़र आती है,जो ऊपरी की मंजिल की तरफ जाती है।
ज्यों ही वह सीढ़ियों पर चढ़ने जाता है उसे कुछ खट्ट-खट्ट की आवाज़ सुनाई देती है।
शायद यह आवाज़ उस खुले मैदान से आ रही थी,जो उस घर से ठीक बगल में था।सुरेश उधर देखता है पर वहां आम के पेड़ों की वजह से अंधेरा और कालिख दिखाई देता है।
सुरेश अपने मोबाइल का टार्च उस तरफ करता है।
उधर देखते ही वह एक दम से चौंक जाता है।
“अरे यह तो राधिका भाभी हैं”
वह चिल्लाता है..”राधिका भाभी!
क्या वहाँ आप हैं?
उधर से भर्राई हुई आवाज़ में ,”कौन”?
सुरेश बाउंड्री को छलांग लगा कर उस पार कूद जाता है।
अरे भाभी,आप भी कमाल करती हैं।आप यही बगल में हैं,पर आप को अपने बच्चे की आवाज़ तक सुनाई नहीं दे रही है।
मैं सड़क के उस पार से भागता हुआ आ रहा हूं,यह कहता हुआ सुरेश उस महिला के एक दम करीब आ जाता है।

पर भाभी,आप इतनी रात में कुदाल ले कर क्या खोद रही हैं?
सुरेश महिला के मुँह की तरफ अपने मोबाइल की रोशनी दिखाता है।
पसीने में डूबी,बाल बिखरे हुए,आँख लाल,जैसे कई रातों से सोई न हो।

भाभी क्या हो गया आप को? कैसी हालात बना रखा है?आखिर यहां कर क्या रहीं हैं?

महिला अपने हाथ में लिए हुए टार्च की रोशनी से एक तरफ इशारे कर के दिखाती है।
सुरेश देखते ही एक दम से सहम जाता है।जैसे उसे लकवा मार दिया हो।
आँखे बाहर,शरीर में अकड़न,जुबान अस्पष्ट!
ये ये ये….तो राजन भैया हैं!
क्या ये भी..?
पर घर के और लोग कहाँ हैं?
वह महिला टॉर्च के रोशनी से बगल के चार कब्रों की तरफ़ इशारा करती है।

सुरेश आँखे बाहर किये दो कदम पीछे हट जाता है।

मुहल्ले में कंधा देने के लिए अब कोई बचा नहीं है,इस लिए सबको यहीं पर दफना दिया।
अच्छा सुनो,अब जब तुम आ ही गए हो तो थोड़ा सा हाथ लगा दो।
गढ्ढा खोदते-खोदते मैं थक गई हूं।

यह बात सुनते ही सुरेश को अचानक उबकाई आने लगता है।
वह तुरंत वहां से भाग जाना चाहता है।उसे अपनी अम्मा और बाबू जी का ख्याल आने लगता है।
वहां से वह तेज़ी से भागने लगता है।वह महिला रस्यमयी अंदाज में बोलती है “अरे सुरेश सुनो…,भाग क्यों रहे हो”।
भागते हुए सुरेश का पांव खीचड़ में फिसल जाता है।उसका शरीर कीचड़ से डूब जाता है।उसे सांसे तेज़ हो जाती है।उसे लगता है इन कीचड़ों में छुपे ‘वायरस’ उसे लपेटे जा रहें है।
वह जल्दी से उठ कर वहां से भागता है।जोर-जोर से उसकी सांस फूलने लगती है।उसके पैर तेज़ चल रहे हैं पर उसका घर जैसे बहुत दूर चला गया हो।
वह घर के पास पहुँचता है तो देखता है उसके घर के ठीक पास कुछ कुत्ते मिल कर एक बड़े से मांस के लोथड़े को झिंझोड़ रहे थे।जैसे कोई इंसान हो।

वह पसीने में डूबा अपने दरवाज़े को जैसे ही खोलता है तो देखता है उसकी माँ और बाबू जी जोर-जोर खांस रहें हैं।
वह चिल्लाता है अम्मा…अम्मा….।

तब तक जैसे उसको किसी ने पीछे से पकड़ कर जोर से हिला दिया हो ।

वह नींद से जाग जाता है।उसके सामने उसकी अम्मा कुछ बोलती हुई नज़र आती हैं।
उनकी आवाज एक दम शख़्त थी
,’ कब से तुम सपने में चिल्लाए जा रहे हो।इतना कोई सोता है।दिन में चार-चार घण्टे सो रहे हो
सुरेश अपने शरीर को टटोलता है शायद देखना चाहता है कि कहीं उसे कीचड़ तो नहीं लगी।
बगल में पड़े मोबाइल में तारीख देखता है” 28 मई”।उसे राहत मिलती है।उफ्फ बहुत बुरा सपना था!!
उसके माथे पर छिटक आये पसीने अब धीरे-धीरे गायब होने लगे थे ।

उधर सुरेश की अम्मा बोले जा रही थी जब से लॉक डाउन हुआ है तब से तुम आलसियों को बस सोना-सोना और सोना।
काम-धाम तो कुछ है नहीं।
पता नहीं कब ये लॉक डाउन खुलेगा।मुझे तो लगता है ये सब ड्रामेबाजी चल रही है।
कोरोनॉ-फोरोना कहीं किसी को दिख तो रहा नहीं ।टीवी वाले सब फालतू के आंकड़े दिखा-दिखा कर डराए जा रहें हैं।मैनें तो नहीं देखा किसी को भी मरते हुए।

सुरेश अपनी माँ की बातें सुनते-सुनते टीवी खोल देता है।
समाचार में..”शराब की लाइनों में लगे लोगों ने शोषल डिस्टेंसिंग की उड़ाई धज्जियां।
तमाम प्रवासी मजदूर में शोषल डिस्टेंसिंग का कहीं नहीं दिख रहा असर!
शहरों,बाजारों में लोग खुलेआम बिना मास्क के सड़कों पर घूम रहे हैं!
क्वारन्टीन किए गए लोगों ने खाने को लेकर मचाया बवाल!
लॉक डाउन में ढील होने से लोगों ने मनाया उत्सव!
ख़ुशी में छोड़े पटाखे,नृत्य और संगीत का लिया आनंद।
शोषल मीडिया पर मीम बनाने वालो ने कोरोनॉ का बनाया मज़ाक।
पूरे विश्व मे कोरोनॉ से मरने वालों की संख्या पहुँची करोड़ों में..!
………………

सुरेश इन हेडलाइनों को सुन कर सपने की भयावहता का सच फिर से महसूस करने लगता है!!!

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