रंगो का मज़हब

 रंगो का मज़हब

सिद्धार्थ सिंहलंदन वाले ‘

भाई ये तो ग़ज़ब हो गया,
रंगो का भी मज़हब हो गया।
कोविड़-19 में शहर बँटे रेड, ऑरेंज और ग्रीन,
उसमें भी राजनीति ढूँढ रहे कुछ तमाशबीन।

दो पड़ोसी दोस्त फ़ेसबुक में भिड़ गए, एक खुश था कि ज़ीरो केसेज़ वाले क्षेत्र को ग्रीन बोल रहे हैं और दूसरा परेशान की ज़ीरो केस वाले क्षेत्र को ऑरेंज होना चाहिए।
काफ़ी देर की बहस के बाद एक ने कसम खायी आज के बाद सारे नारंगी खाने बंद, दूसरे ने क़सम खायी हरी सब्ज़ियाँ बंद। भले ही मिनरल और विटामिन के लिए गोलियाँ ही क्यूँ ना खानी पड़े।

पहले व्यक्ति हर पहुँचे, घुसते ही आवाज़ आयी ‘आज आपका पसंदीदा गाजर का हलवा बनाया है’। ये सुनते ही भाई साहब के कान टॉम एंड जेरी के स्टाइल में बड़े हो गए। टेन्शन होना स्वाभाविक था एक तो आज ही क़सम खायी और दूसरी ओर पत्नी की मेहनत। दूध और गाजर की 3 घंटे की घुटायी के बाद बनता है गाजर का हलवा। भयानक दुविधा में करें तो करें क्या, जब पत्नी के बनाए नापसंद टिंडे मना नहीं कर पाते तो इसे कैसे मना करें। अंततः उन्होंने सोचा खा लेता हूँ कौन सा जुकरबर्ग ने घर पे कैमरा लगाया हुआ है।

दूसरे महाशय घर पहुँचे, उन्हें बताया गया ‘आपके पसंदीदा मेथी के पराठे बनाए है’। उनकी शकल भी मीम में उपयोग होने ‘what’ की तरह हो गयी बस आवाज़ ना निकली। उनके दिमाग़ में भी पसंद और बीवी की मेहनत वाले सिनारियो आँख के सामने से निकल गए। उन्होंने भी सोचा खा लेता हूँ किसको पता चलेगा।

अगले सुबह दोनो मोर्निंग वॉक पे निकले। पहले व्यक्ति नज़र बचाते हुए निकलने की कोशिश कर रहे थे, दूसरे व्यक्ति ने पकड़ लिया।
“श्रीमती जी बता रही थी की भाभी जी ने ठेले वाले से कल गाजर लिए थे हलवे के लिए, खाया तो होगा ही।”
अब पोल तो खुल ही चुकी थी, पहले व्यक्ति बोले
“हाँ भाई खाया तो लेकिन अफ़सोस ये की इस बार एक कटोरी आपके घर ना भिजवा पाया।”
“वैसे पत्नी बता रही थी कल भाभी जी ने मेथी ली थी, पराठे बने थे या भाजी।”
“हाँ भाई पराठे ही बने थे और श्रीमती जी ने आपके घर के लिए भी बनाए थे, बस पहुँचा ना सका।”

अब तक दोनो को समझ आ चुका था रंगो को मज़हबी रंग देने का कोई फ़ायदा नहीं। फिर दोनो गले मिले और सौहार्दपूर्ण तरीक़े से एक दूसरे के पसंदीदा राजनीतिक दल को गरियाते हुए मोर्निंग वॉक पे चल दिए।

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