सरिता सैल की कविताएँ

 सरिता सैल की कविताएँ


सम्प्रति : कारवार, के कॉलेज में अध्यापन
प्रकाशन : कुछ पत्र पत्रिकाओं में कवितायेँ और लेख प्रकाशितएक संग्रहकावेरी एवं अन्य कवितायेँप्रकाशित

वेश्याएं

वेश्याओं का जन्म!
माँ के गर्भ से नहीं होता है
वो तो खाली तश्तरी से उठकर
स्वार्थ की घने अन्धकार में
हवस की दीवार पर
बिना जड़ की बेल सी पनपती है

उसका मन
हमेशा देहलीज़ पर बैठ
हर दिन गिनता रहता है
उसके ही तन की आवाजाही को
जब वो बाजार के पैने
दांतों पर बैठकर
हवस के पुजारियों की आँखो में
ढूंढती है रोटी
मन उसे वहीं पर छोड़ चला आता
और दहलीज़ पर बैठकर
करता खुद से
अपने अस्तित्व को लेकर अनगिनत
सवाल
आखिर क्यों
अंतड़ियों की भूख भिनभिनाती है
हमेशा मक्खियों की तरह
क्यों नहीं सो पाया बेचैन मन
एक अरसे से
घना अंधेरा क्यों जम जाता है
घर की दहलीज़ पर

मन को लगता है
आंगन के उस पार
एक घना सा बीहड़ है शायद
और उस घने बिहड़ में से
एक खूंखार जानवर
उसके घर के अंदर दाखिल हो गया है

मैं बीज हूँ“】

मै बीज हूँ असीम सहनशक्ति से भरा
मैं गलूँगा मिट्टी में और फिर पनपुंगा इसी मिट्टी में
जब-जब सूरज धरा को रूई सम जलायेगा
मैं अपनी कवच पर असीम पीड़ा झेलूँगा
मैं भूख कि आंखो मे चमकता चाँद हूं
मैं खलिहानों के खुशहाली का गीत हूं
मै बैलों के गले की घंटियों के घुँघरू की आवाज हूँ
मै कड़कती बिजली में खडा़ सिपाही हूँ
मै पाषणी ह्रदय में पनपती नमी हूँ
मै धरा की उर्वरता का नाजुक-सा अंग हूँ
मै चूल्हे की लपटों का स्मित-सा हास्य हूँ
मै तश्तरी में बैठी वंसुधरा का अंश हूँ
मै बोरियों से घिरे मजदूर के पसीने की बूंद हूँ
मै संसद कि गलियारों में उमडती भीड़ हूँ
मै कच्ची पगडंडियों से निकली न्याय कि पुकार हूँ
मै किसान की आँखों का सवाल हूँ
मै सियासती दावपेंच का नीरस सा जवाब हूँ..

तुम्हारे इंतज़ार में

तुम्हारे इंतज़ार में लिखना चाहती हूँ
युद्ध के दस्तावेजों पर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए
जिससे मिट जायेगी युद्धों की तारीखें
पिघल जायेगा औजारों का लोहा
लहरायेगा हवा संघ शांति का परचम
इंगित होगा जिसपर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए

तुम्हारे इन्तजार में मैं लिखना चाहती हुं
रेगिस्तान की पीठ पर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए
जिससे पिघलेंगे विरह के बादल
तपती रेत से निकलेगी एक नदी
हो जायेगी तृप्त हर गगरी की देह
गोद दूंगी पानी के ह्रदय में मेरा प्रेम तुम्हारे लिए

तुम्हारे इन्तजार में मैं लिखना चाहती हुं
मिट्टी में धंसे पंगड़डियों पर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए
और वहां बैठ मैं गुनगुनाना चाहती हूं
एक गीत वर्षा के आगमन का
निराश किसानों की पुतलियां अंकुरित कर
धान की पातियो पर अंकित करुंगी मेरा प्रेम तुम्हारे लिए
युध्द

कितने युद्धों की बनूँ मैं साक्षी
हर कदम की दूरी पर
नींव पड़ती नए युद्ध की
समेटने का क्रम नाकाफी
विस्थापन का विस्तार
उजाड का फैलाव
होता जा रहा अनंत
न आप, न मैं
कदाचित कभी न गुज़रेंगे
युध्द की इति के उत्सव से
यह फसल
आयुधों की लहलहाती
पहुँचाएगी हमें
शायद
सृष्टि के पतझड़ तक
कैसा यह
विनाश का खेल ..

बेवफ़ाई का समंदर

रात बिरात
एक कसक सी उठ जाती है
शब्दों को आंसुओं से भिगो कर
जलाती हू एक दिया
उसकी राख़ से
दर्द का काजल
नैनों मे सजाती हूँ

तुम्हारे बेवफाई के संमदर मे
तैरने लगता है
मेरे नैनों का काजल

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