सुरेखा साहू की कविताएँ

 सुरेखा साहू की कविताएँ

सुरेखा साहू
शिक्षा- बी.टेक (इलेक्ट्रिकल) ऍम टेक
आप भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं | इन्होंने, दो तीन सालों से ही कविताओं द्वारा अपनी भावनाओं को व्यक्त करना शुरू किया है | इनके हिसाब से, आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक दूसरे से बात करने का समय ही नहीं मिल पाता है और कई अनकही बातें मन में रह जाती हैं जो बाद में किसी ना किसी परेशानी के रूप में उभर कर आती हैं | जबसे कविताओं द्वारा इन्होनें अपनी भावनाओं को व्यक्त करना शुरू किया है उन्हें बहुत ही सुकून मिला है| इनकी कविताएं बहुत सरल और रोजमर्रा के अनुभव से जुड़ी होती हैं | आप कई काव्य सम्मलेन में सम्मिलित हो चुकी हैं|
पता- नई दिल्ली
ईमेल- surekhasahu@yahoo.com

【दोस्ती】

एक मीठा सा एहसास है दोस्ती
जीवन भर की सौगात है दोस्ती
रिश्ता दिल का एक खास है दोस्ती …

ईश्वर का दिया वरदान है दोस्ती
निस्वार्थ प्रेम और विश्वास है दोस्ती
मुश्किलों में संभालने वाला हाथ है दोस्ती…

एक अनमोल रतन है दोस्ती
आयोजन प्रयोजन से परे है दोस्ती
खुशियों के खजाने की चाभी है दोस्ती…

मीठी शरारतों का नाम है दोस्ती
उदास चहरे की मुस्कान है दोस्ती
जिंदगी भर का प्यार है दोस्ती…

【सुबह का सूरज 】

आज दिखा कुछ बिखरा हुआ आकाश
जैसे फैला दी हो किसी ने रजाई की कपास
सुबह -सुबह यह देख हम लगाते रहे कयास
कैसे करे उसे लिहाफ में डालने का प्रयास .

देख यह कौंधा हमें एक अनोखा विचार
क्यों न लिखे इस पर हम पंक्तियां चार
दिखाएं अपनी कविता से उन्हें यह नज़ारा
जिन्होंने सुबह का समय बिस्तर पर गुज़ारा .

फिर आई याद माँ की पुरानी वह बात
सही कहा करती थी बात माँ यह हमेशा
जिसने सुबह का समय बिस्तर पर खोया
प्रकृति के अनमोल आशीर्वाद से हाथ धोया .

शुद्ध, ताजी चले पवन, पक्षियों का कलरव
शांत, सुहावना और मनोरम वातावरण
स्फूर्ति करता प्रदान कर मन को शांत
देर से जागने वाले पाए न इसका स्वाद .

छोड़ यह ख्याल लिखने बैठें हम कविता
लिख पाए मुश्किल से सिर्फ चार पंक्तियां
चुपके किसी ने भर दी लिहाफ़ में कपास
देख इसे हमने भी छोड़े अपने सारे प्रयास .

दिखा तभी पूरब से सूर्य उगता मुस्कुराता
अपने प्रकाश से सारे जग को चमकाता
छोड़ दुनिया की फिक्र लगे उसे निहारने
सुबह का यह अनोखा रूप खोएं सोने वाले.

【जाने क्यों 】

जाने क्यों ये दुनियाँ मुझे बदनाम करती है ,
चलूं मैं राह सीधी फिर भी मुझे परेशान करती है .

जाने क्यों ये दुनियाँ मुझे इतना हैरान करती है,
बोलूं मैं सच फिर भी झूठे का ही ऐतबार करती है .

जाने क्यों ये दुनियाँ पैसों को सलाम करती है ,
काबिलियत और हुनर को पैसों पे कुर्बान करती है .

जाने क्यों ये दुनियाँ कत्ल गुमनाम करती है ,
रात के अंधेरे में ही जुल्मों सितम के काम करती है .

जाने क्यों ये दुनियाँ जीना हराम करती है ,
सुकुं से जीने की मेरी सारी कोशिश नाकाम करती है .

【वो हमेशा साथ मेरे होती】

उनसे कोई बात नहीं होती
कोई मुलाक़ात नहीं होती
जाने क्यों फिर भी लगता है
वो हमेशा साथ मेरे होती

जब भी कोई मुश्किल होती
या परेशानी आ खड़ी होती
सीधा आसान सा उपाय लिए
वो हमेशा साथ मेरे होती

काश वो मेरी हमसफ़र होती
जो दिल की कुछ बात भी होती
मैं तो कुछ नहीं लगता उनका
वो हमेशा साथ मेरे होती

जो तबीयत मेरी नासाज़ होती
आँखों से नींद नदारत होती
मेरा बनकर एक हम साया
वो हमेशा साथ मेरे होती

राह में जब कोई मुश्किल होती
या रात ग़मों की लंबी होती
मेरी हिम्मत और हौसला बन
वो हमेशा साथ मेरे होती

【मुश्क़िलों का दौर मज़े में गुज़ारिए】

जिंदगी के तारों को इतना ना उलझाइए
जो सुलझाने बैठे तो खुद ही उलझ जाइए
माना ये दौर जो चल रहा है मुश्किलों भरा
इसे सब्र और शुक्रगुज़ारी में गुज़ारिए.

खाव्हिशें अपनी आप ज़रा संभल कर रखिए
पहले अपनी जरूरतों को आप पूरा करिए
खाव्हिशें का क्या है वे तो हर पल हैं बदलती
जैसे हों हालत ज़िन्दगी शान से गुजारिए.

दिल के अपने दरवाज़े खोल औरों की सुनिए
कभी अपने दिल की बात भी उन्हें बताइए
खत्म कर अपने सारे पुराने गिले शिकवे
दो पल की जिंदगी इसे प्यार से गुजारिए .

हाथ अपना मदद के लिए आगे बढ़ाइए
पड़े ज़रूरत बेहिचक दुसरे का हाथ थामिए
बनकर एक दूसरे का एक मज़बूत सहारा
मुश्क़िलों का ये दौर है इसे मज़े में गुज़ारिए ।

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3 Comments

  • Very nice poems mam

    • Thanks a tonDeepti

    • Thanks a ton deepti

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