संतोष पटेल की कविता ‘स्पीड’

 संतोष पटेल की कविता ‘स्पीड’

तुम कब रुकोगे

‘स्पीड’
करना चाहिए मनन कभी
जरूरी है ध्यान से विचारना
उलझा रखा है जिस शब्द ने
मानव जीवन को
बेतरतीब तरीके से
कहते हैं सभी
गति ने गति दी है जीवन स्तर को
गति दी है बहुमुखी विकास को
दिया है उसे नया आयाम
पर आये हैं साथ में
इसके भी कुछ दुष्परिणाम।

अब देखिये ना!
कितनी आवश्यकता है सभी को
स्पीड की, यात्रा के लिए
बस नहीं ट्रेन चाहिए
सुपर फास्ट नहीं
दुरंतो भी नहीं
राजधानी, शताब्दी या
बंदे भारत भी नहीं
आन आ पड़ी है बुलेट ट्रेन की
गति ने आम कर दी हवाई यात्रा
जो थी कभी खास।

मोबाइल में हो या हो लैपटॉप में
डेस्कटॉप पर हो
या हो आई पैड
नहीं चाहिए नेट स्पीड थ्री या फ़ॉर जी
चाहिए स्पीड सीधा 5 जी
कोई और हो फ़ास्ट स्पीड वाला
लपक ले इन्सान उसे झट से।

महानगर में बसों की जगह
ले ली है मेट्रो ने
मेट्रो में एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन
जिसमें होते हैं कम ठहराव
मेट्रो के साथ आ गए मोनो रेल
यह है दौड़ती भागती
जिन्दगी की दास्तान

स्पीडी रिकवरी के लिए
जल्द इलाज के लिए
खुल गए सुपर स्पेशलिटी,
फाइव स्टार से सेवन स्टार हॉस्पिटल

बहुत है फायदे इसमें भी
कार्यों का होता त्वरित निष्पादन,
यात्रा में लगता है कम समय
और शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ भी

लेकिन एक वैश्विक संकट ‘कोरोना’
लगा दिया है इस वायरस ने
इस ‘स्पीड’ पर मानो ब्रेक
और दुनिया हो गई है स्टैंड स्टील

आज इंसान अपने अपने दरबे में
हो गया है कैद
कर रहा है हिफाजत
अपने जान की
आवश्यकता है उसको
विश्राम की
तभी तो तथागत बुद्ध ने कहा था अंगुलिमाल को
मैं तो रूक गया
तुम कब रुकोगे?

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